शिक्षा का उद्देश्य क्या है (what is the aim of education)

aim of education

बालकों को शिक्षा केवल स्कूलों तहत कॉलेजों में ही दी जाती है। परन्तु वास्तविकता यह है कि स्कूलों तथा कॉलेजों के अतिरिक्त बालक अनके साधनों के द्वारा शिक्षा प्राप्त करता है। प्रशिद्ध शिक्षा शास्त्री जॉन डीवी के अनुसार शिक्षा का अर्थ है – जीवन अथवा विकास। उसका मत है कि जीवन अथवा विकास का अच्छा या बुरा होना वंशानुक्रम तथा वातावरण पर निर्भर करता है। वंशानुक्रम निश्चित होता है , परन्तु वातावरण को परिवर्तन द्वारा अच्छा या बुरा बनाया जा सकता है। अत: जीवन अथवा विकास का अच्छा या बुरा होना वातावरण पर निर्भर करता है इस दृष्टि से बालक के जीवन तथा विकास के लिए उपयुक्त वातावरण प्रस्तुत करना ही शिक्षा है। परिवार समुदाय, धर्म, राज्य, स्कूल, पुस्तकालय, पुस्तक रेडियो, सिनेमा, टेलिविज़न, प्रदर्शनी तथा समाचार-पत्र आदि सब ऐसे तत्व है जो बालक को हर प्रकास का वातावरण प्रस्तुत करते हैं। शिक्षा में इन सभी तत्वों को शिक्षा के साधनों की संज्ञा दी जाती है। साधन क अंग्रेजी में एजेंसी कहते हैं एजेंसी का अभिप्राय है एजेंट उस व्यक्ति को कहते हैं जो किसी कार्य को करे अथवा किसी प्रभावित करे। इस दृष्टि से भी ये सभी तत्व अथवा संस्थायें शिक्षा के साधन है क्योंकि ये बालक पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तथा चेतन अथवा अचेतन रूप से शैक्षणिक प्रभाव डालते रहते हैं।

भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अनगिनत उपलब्धियां हासिल की हैं। 70 मिलियन (7 करोड़) से अधिक बच्चे प्री-प्राइमरी स्कूल में शामिल होते हैं और,  उच्च प्राथमिक (निम्न माध्यमिक) में बच्चों के नामांकन की भागीदारी में लगातार वृद्धि हो रही है।

भारत सरकार के शिक्षा के अधिकार अधिनियम लागू होने की वजह से 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों में स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों आउट ऑफ स्कूल चिल्ड्रन (OOSC) की संख्या में कमी आई है, जो 2006 में 13.46 मिलियन की तुलना में 2014 में घटकर 6 मिलियन रह गई। 6 मिलियन बच्चों में, जो अभी भी स्कूल से बाहर हैं, उनमें से अधिकांश अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों सहित वंचित  समुदायों।

100 छात्रों में से 29 प्रतिशत लड़कियां और लड़के प्राथमिक शिक्षा का चक्र पूरा करने से पहले स्कूल से बाहर निकल जाते हैं, और इनमें सबसे ज्यादा वंचित समुदाय के बच्चे होते हैं।

चुनौतियां बनी हुई हैं क्योंकि अधिकांश बच्चे जो स्कूल में हैं, वे अपनी कक्षाओं के स्तर के अनुरूप नहीं सीख रहे हैं। खराब गुणवत्ता वाले शिक्षण और सीखने की परंपरा के परिणाम स्वरूप स्कूलों में कम उपस्थिति होती है साथ ही बाल-विवाह, बाल-श्रम या हिंसा या शोषण के कारण बच्चे समय से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं । मौसमी प्रवासन, गरीबी, सामाजिक सुरक्षा के अभाव और जागरूकता की कमी के कारण भी बच्चे स्कूल जाना बंद कर देते हैं।

शिक्षा का उद्देश्य (aim of education)

महात्मा गांधी – “शिक्षा से मेरा का तात्पर्य बालक और मनुष्य के शरीर, मन तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्कृष्ट विकास से है।”

स्वामी विवेकानंद – “मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति ही शिक्षा है।”

राधा मुकुन्द मुखर्जी – “प्राचीन काल में शिक्षा मोक्ष के लिए आत्म ज्ञान का साधन थी, इस प्रकार शिक्षा जीवन के अंतिम उद्देश्य यानि मोक्ष प्राप्ति का साधन मानी जाती थी।”

जॉन डुई – “शिक्षा व्यक्ति के उन सभी भीतरी शक्तियों का विकास है जिससे वह अपने वातावरण पर नियंत्रण रख कर अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर सकें।”

पेस्टालॉजी – “शिक्षा मानव की संपूर्ण शक्तियों का प्राकृतिक प्रगतिशील और सामंजस्यपूर्ण विकास है।”

राष्ट्रीय शिक्षा आयोग 1964-66 – “शिक्षा राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक विकास का शक्तिशाली साधन है। शिक्षा राष्ट्रीय संपन्नता एवं राष्ट्र कल्याण की कुंजी है।”

दुनिया की प्रगतिवादी विचारों ने बच्चों के अधिकारों के दृष्टिकोण से स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के मुताबिक, शिक्षा के व्यापक लक्ष्य हैं जैसे- बच्चों के भीतर विचार और कर्म की स्वतंत्रता विकसित करना, दूसरों के कल्याण और उनकी भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता पैदा करना, और बच्चों को नई परिस्थितियों के प्रति लचीले और मौलिक ढंग से पेश आने में मदद करना। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे उनके भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेने की, और मौलिक अभिव्यक्ति की प्रवृत्ति, तथा सौन्दर्यबोध की समझ विकसित हो और साथ ही आर्थिक प्रक्रियाओं व सामाजिक बदलाव की ओर कार्य करने व उसमें योगदान देने की क्षमता भी विकसित हो सके।

वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य आदर्श और महान था। लेकिन समय के साथ-साथ शिक्षा के उद्देश्यों में भी परिवर्तन होता रहा वैदिक काल में जहां शिक्षा अध्यात्म , संगीत, वेद उपनिषद, राजनीति, रणकौशल, आदि पर आधारित हुआ करती थी। मध्यकाल में शिक्षा का उद्देश्य धर्म के प्रचार – प्रसार के लिए हो गया। वहीं आधुनिक काल में शिक्षा का उद्देश्य पुनः बालक के सर्वांगीण विकास पर आधारित हो गया।

इस शिक्षा में बालक के मस्तिष्क के विकास की ही नहीं बल्कि उसके शारीरिक विकास पर भी ध्यान दिया जाता है। आधुनिक पाठ्यक्रम में बालक के हर एक रूचि को ध्यान में रखा जाता है अथवा उसके सर्वांगीण विकास पर विशेष बल दिया जाता है। जिसमें चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व का विकास, नागरिक और सामाजिक कर्तव्यों का पालन, सामाजिक सुख और कौशल की उन्नति, राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण और प्रसार शामिल है।

अलग-अलग काल में व्यक्तियों ने अलग-अलग तरीके से जीवन में शिक्षा के उद्देश्य को समझाने का प्रयास किया है। शिक्षा के कई अन्य सार्थक उद्देश्य भी हो सकते हैं। शिक्षा भी मनुष्यों को दो अलग प्रजातियों में बांटती है, शिक्षित व अशिक्षित व्यक्ति में। मनुष्य का व्यक्तित्व बताता है कि वह किस तरह से शिक्षित हुआ है। शिक्षा लक्ष्य प्राप्ति के लिए एक उत्तम साधन है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शिक्षित होने की बात करें तो यह भी उसी दिशा में जाती है जैसा की शिक्षाविदों ने बताया है। विज्ञान भी जीवन की उत्पत्ति एवं सुखद अंत या फिर जीवन एवं मृत्यु से जुड़े सबसे जटिल सवालों के जवाब खोजने में लगा है।

आज शिक्षा का बाजारीकरण होने के कारण सभी वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्त करना कठिन हो गया है, आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चे करियर बनाने के लिए जिस क्षेत्र में जाना चाहते हैं वो वहां तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

वैसे तो शिक्षा पर सबका समान अधिकार माना जाता है लेकिन हकिक़त इसके विपरीत है। ऐसे में इस मुद्दें पर हर संभव प्रयास करने की ज़रूरत है जिससे हर जाति और वर्ग में शिक्षा का समान वितरण संभव हो सके।

शिक्षा का व्यक्तिगत उद्देश्य भी हो सकता है यदि मानव व्याक्तिगत रूप से स्वयं में आत्मशांति के लक्ष्य को पूर्ण कर लेता है तो यह, शिक्षा का एक उचित पड़ाव होगा।

वहीं शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य कहता है कि समाज प्रत्येक मनुष्य का है। समाज में रहकर वह अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकता है एवं अच्छी तरह से अपने समाज को शिक्षित कर सकता है।