पटाखे क्या है? और ग्रीन पटाखे क्या होते हैं।

what is ptake and green ptake

पटाख़ा एक छोटी-सी विस्फोटक आतिशबाज़ी है। जो भारी आवाज या शोर उत्पन्न करने के उद्देश्य से बनायी जाती है। पटाख़ों का आविष्कार चीन में हुआ। इसमें अधिकतर कम-ज्वलनक बारूद प्रयोग में लाया जाता है। पटाखे बनाने में प्रयोगित मुख्य रसायन कृषि में प्रयोग किये जाने वाले रसायन होते हैं, जैसे कि कलमी शोरा (पोटैशियम नाइट्रेट) व गंधक (सल्फ़र) कोयला प्रयोग किया जाता है। यह बड़ी ही आसानी से किसी भी खेती-बाड़ी की दुकान से प्राप्त हो जाते है।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दीपावली के मौके पर पटाखों की बिक्री से संबंधित एक फैसले के दौरान ग्रीन पटाखों का ज़िक्र किया था। कोर्ट ने मशविरा दिया था कि त्योहारों पर कम प्रदूषण करने वाले ग्रीन पटाखे ही बेचे और जलाए जाने चाहिए। आपको बता दें कि इन ग्रीन पटाखों की खोज भारतीय संस्था राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने की है। दुनियाभर में इन्हें प्रदूषण से निपटने के एक बेहतर तरीके की तरह देखा जा रहा है।

  • पिछले साल से दिल्ली-एनसीआर में दिवाली पर ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल का निर्णय लिया गया
  • इससे 30 से 35 प्रतिशत कम प्रदूषण होता है, लेकिन स्थाई समाधान नहीं
  • ग्रीन पटाखों में बेरियम नाइट्रेट का इस्तेमाल नहीं, एल्युमिनियम भी कम
  • इनकी कीमत ज्यादा, रोशनी कम। मार्केट में जरूरत के हिसाब से सिर्फ 5-10 प्रतिशत ही मौजूद

ग्रीन पटाखे क्या हैं: औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की संस्था नीरी ने ऐसे पटाखों की खोज की है। जो पारंपरिक पटाखों जैसे ही होते हैं। पर इनके जलने से कम प्रदूषण होता है। इससे आपकी दीवाली का मज़ा भी कम नहीं होता क्योंकि ग्रीन पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं। हालांकि ये जलने पर 50 फीसदी तक कम प्रदूषण करते हैं।C5

कितने तरह के होते हैं: नीरी के मुताबिक इस साल कई तरह के ग्रीन पटाखे बाजार में उपलब्ध होंगे। पिछले दिनों केंद्रीय विज्ञान मंत्री हर्षवर्धन ने सीएसआईआर-नीरी के वैज्ञानिकों के साथ ग्रीन पटाखों को एक प्रोग्राम में रिलीज भी किया। ग्रीन पटाखे मुख्य तौर पर तीन तरह के होते हैं। एक जलने के साथ पानी पैदा करते हैं जिससे सल्फ़र और नाइट्रोजन जैसी हानिकारक गैसें इन्हीं में घुल जाती हैं। इन्हें सेफ़ वाटर रिलीज़र भी कहा जाता है। दूसरी तरह के स्टार क्रैकर के नाम से जाने जाते हैं और ये सामान्य से कम सल्फ़र और नाइट्रोजन पैदा करते हैं। इनमें एल्युमिनियम का इस्तेमाल कम से कम किया जाता है। तीसरी तरह के अरोमा क्रैकर्स हैं जो कम प्रदूषण के साथ-साथ खुशबू भी पैदा करते हैं।

  • पानी पैदा करने वाले पटाखेः ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फ़र और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे। नीरी ने इन्हें सेफ़ वाटर रिलीज़र का नाम दिया है। पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है। पिछले साल दिल्ली के कई इलाक़ों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर पानी के छिड़काव की बात कही जा रही थी।
  • सल्फ़र और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले पटाखेः नीरी ने इन पटाखों को STAR क्रैकर का नाम दिया है, यानी सेफ़ थर्माइट क्रैकर. इनमें ऑक्सीडाइज़िंग एजेंट का उपयोग होता है। जिससे जलने के बाद सल्फ़र और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं। इसके लिए ख़ास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है।
  • कम एल्यूमीनियम का इस्तेमालः इस पटाखे में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फ़ीसदी तक कम            एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है। इसे संस्थान ने सेफ़ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी SAFAL का नाम दिया है।
  • अरोमा क्रैकर्सः इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ़ हानिकारण गैस कम पैदा होगी बल्कि ये बेहतर खुशबू भी बिखेरेंगे।

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ग्रीन पटाखे कहां मिलेंगे है : पिछले साल जब सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल की सलाह दी थी। तब उन्हें बाजार में उपलब्ध कराने के लिए ज्यादा समय नहीं था। लेकिन इस बार बाजार में ग्रीन पटाखे पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं। आप कहीं भी पटाखों की दुकानों से इन्हें खरीद सकते हैं। एक बार दुकानदार से ये कन्फर्म जरूर कर लें कि ये ग्रीन पटाखे हैं या नहीं। फ़िलहाल भारत के बाज़ारों में पारंपरिक तरीके़ से पटाखों का निर्माण हो रहा है। हालांकि कुछ केमिकल पर प्रतिबंध लगने के बाद कई तरह के पटाखों का निर्माण बंद हो चुका है। नीरी ने भले ही ग्रीन पटाखे बनाए हों, लेकिन इसके निर्माण की ज़िम्मेदारी भारतीय बाज़ारों पर ही होगी। ऐसे में बिना बेहतर प्रशिक्षण के इसे बनाना चुनौती होगी।

ग्रीन पटाखों से पलूशन 35% कम : CSIR के इन ग्रीन पटाखों के जरिए खतरनाक नाइट्रस ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड के साथ ही छोटे-छोटे कणों के उत्सर्जन में भी 30 से 35 प्रतिशत की कमी लायी जा सकेगी। हालांकि इन पटाखों का उत्पादन कब शुरू होगा और ये ग्रीन पटाखे इस बार की दिवाली से पहले आम लोगों को मिल पाएंगे या नहीं कहना मुश्किल है।

पटाखा उत्पादन में दूसरे नंबर पर भारत : पूरी दुनिया में पटाखों का सबसे बड़ा उत्पादक चीन है और दूसरे नंबर पर भारत जहां के तमिलनाडु के सिवाकाशी को पटाखा उत्पादन का गढ़ माना जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि पटाखे हमारे देश में मुगलों के समय से ही जलाए जा रहे हैं। मुगलों के दौर में आतिशबाजी और पटाखे इस्तेमाल होते थे। वैसे तो गन पाउडर बाद में भारत में आया और इसके बाद पटाखों में गन पाउडर का इस्तेमाल होने लगा।

ग्रीन पटाखों की कीमत क्या है : ये पटाखे तमिलनाडु के शिवकाशी में बन रहे हैं। लेकिन कच्चे माल की सप्लाइ काफी कम है। इस वजह से ग्रीन पटाखे में कम बन पा रहे हैं। राजस्थान में भी ग्रीन पटाखे बनाए जा रहे हैं, बावजूद इसके सप्लाइ और मांग में भारी अंतर है। इनकी कीमत सामान्य पटाखों से 50 से 100 प्रतिशत तक ज्यादा है।

पटाखाग्रीन पटाखासामान्य पटाखा
फुलझड़ी350-400 रुपये200-250 रुपये
अनार400-450 रुपये250-300 रुपये

पटाखे सेहत के लिए हानिकारक हैं : प्रदूषण फैलाने में पटाखों का रोल बहुत ज़्यादा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि लोग एक तय समय में बहुत ज्यादा पटाखे फोड़ते हैं। साथ ही पटाखे जलाने वाला व्यक्ति थोड़ी सी जगह में ढेर सारे पटाखे जलाता है जिससे निकलने वाला धुंआ सीधा हमारे शरीर के अंदर जाता है। पटाखों से निकलने वाले धुएं की वजह से अक्यूट अस्थमा का अटैक आ सकता है, निमोनिया के मामले बढ़ सकते हैं, फेफड़ों से संबंधित गंभीर बीमारी हो सकती है, सांस लेने में तकलीफ होने लगती है।

पटाखों से पर्यावरण को बचाना : पर्यावरण को बचाना आज हमारी सबसे बड़ी जरूरत है। विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का लगातार दोहन हो रहा है। ऐसे में समन्वय बना रहे इस पर हमें ध्यान देना होगा। हमारी परंपरा और संस्कृति में पर्यावरण के संरक्षण की बात कही गई है। पर्यावरण के बगैर मानवीय जीवन का अस्तित्व संभव नहीं है। दीपावली साफ सफाई का पर्व है। दीपावली बुराई पर अच्छाई का पर्व है। दीपावली शीत ऋतु के आगमन का पर्व है। लेकिन दीपावली के त्योहार के महीने भर पहले ही बाजारों में पटाखों की दुकानें सजने लग जाती हैं। प्रतिवर्ष दीपावली पर करोड़ों रुपयों के पटाखों का व्यापार होता है। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता है। कुछ लोग इसे फिजूलखर्ची मानते हैं, तो कुछ इसे परंपरा से जोड़कर देखते हैं। पटाखों से बसाहटों, व्यावसायिक, औद्योगिक और ग्रामीण इलाकों की हवा में तांबा, कैल्शियम, गंधक, एल्यूमीनियम और बेरियम प्रदूषण फैलाते हैं। उल्लिखित धातुओं के अंश कोहरे के साथ मिलकर अनेक दिनों तक हवा में बने रहते हैं। उनके हवा में मौजूद रहने के कारण प्रदूषण का स्तर कुछ समय के लिए काफी बढ़ जाता है। paryaavaran kee raksha min

विभिन्न कारणों से देश के अनेक इलाकों में वायु प्रदूषण सुरक्षित सीमा से अधिक है। ऐसे में पटाखों से होने वाला प्रदूषण भले ही अस्थायी प्रकृति का होता है लेकिन उसे और अधिक हानिकारक बना देता है। औद्योगिक इलाकों की हवा में विभिन्न मात्रा में राख, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और अनेक हानिकारक तथा विषैली गैसें और विषाक्त कण होते हैं। इन इलाकों में पटाखे फोड़ने से प्रदूषण की गंभीरता तथा होने वाले नुकसान का स्तर कुछ दिनों के लिए बहुत अधिक बढ़ जाता है। महानगरों में वाहनों के ईंधन से निकले धुएं के कारण सामान्यतः प्रदूषण का स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक होता है। पटाखे उसे कुछ दिनों के लिए बढ़ा देते हैं। उसके कारण अनेक जानलेवा बीमारियों मसलन – हृदय रोग, फेफड़े, गॉल ब्लैडर, गुर्दे, यकृत एवं कैंसर जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा पटाखों से मकानों में आग लगने तथा लोगों खासकर बच्चों के जलने की संभावना होती है एवं हवा के प्रदूषण के अलावा पटाखों से ध्वनि प्रदूषण होता है। कई बार शोर का स्तर सुरक्षित सीमा को पार कर जाता है। यह शोर कई लोगों तथा नवजात बच्चों की नींद उड़ा देता है। नवजात बच्चों और गर्भवती महिलाओं को डराने के साथ यह पशु-पक्षियों तथा जानवरों के लिए भी अभीष्ट नहीं है।

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