हृदय रोग एवं प्राकृतिक चिकित्सा (Heart disease and Naturopathy)

Naturopathy & Heart Disease in hindi

हृदय रोग एवं प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा, स्वास्थ्य का महाविज्ञान है। प्रकृति के नियमों को समझ कर उसके अनुसार आचरण करना ही वैज्ञानिक जीवन जीने का सम्यक सूत्र है। मरते दमतक भी हंसते-हंसते जीना स्वस्थ जिंदगी जीने की एक कला है।

हमारा शरीर प्रकृति के विभिन्न तत्वों का संयोग है। प्राकृतिक चिकित्सा में इन्हीं तत्वों का चिकित्सकीय प्रयोग किया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में जल मिट्टी, आहार, उपवास, योगासन, प्राणायाम ध्यान का उपयोग कर शरीर एवं मन को स्वस्थ किया जाता है।

आज शरीर और मन से अस्वस्थ व्यक्ति जीवन की ओर लौटना तथा प्राकृतिक चिकित्सा ही एक मात्र योग्य कार्यक्रम है।

बीमारियों के मुख्य कारण

(1) गलत भोजन
(2) नकारात्मक विचार एवं गलत विचार
(3) गलत रहन सहन

प्राकृतिक चिकित्सा सिद्धांत

(1) हर व्यक्ति के शरीर में रोग मुक्त होने की प्रबल शक्ति होती है, प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग इस शक्ति को बढ़ाते है।
(2) शरीर में विजातीय पदार्थ का इकट्ठा होना सभी रोगों का कारण है, प्राकृतिक चिकित्सा से इन सभी विजातिय पदार्थ को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
(3) प्राकृतिक चिकित्सा जड़ मूल से रोग को दूर करने का एक विज्ञान है।

प्राकृतिक चिकित्सा एवं हृदय-परिचय

हृदय विशिष्ट प्रकार के स्नायुओं से बना एक प्राकृतिक पम्प है। जो तालबद्ध रूप से निरंतर धड़कता रहता है। समान्यतः हृदय एक मिनट में 72 बार धड़कता है।

प्रत्येक संकोचन के समय हृदय लगभग 70 मि0लि0 रक्त धमनियों में उड़ेलना है। इस मात्रा को स्ट्रोठ वालयुम कहा जाता है। इस प्रकार एक मिनट में हृदय लगभग 5 लिटर रक्त धमनियों में छोड़ता है, इस मात्रा को कार्डियेक आउट पुट कहते है।

हृदय से निकलने वाली महाधमनी एँआर्टा भिन्न-भिन्न शाखाओं में विभाजित होती है जिससे रक्त शरीर के हर हिस्से में पहुचना है। शिराओं के माध्यम से शरीर के हर हिस्से से अशुद्ध रक्त हृदय में वापस आता है

और हृदय से अशुद्ध रक्त फेफड़ो में जाकर शुद्ध होकर वापस हृदय में आकर एँआटो के माध्यम से पुरे शरीर में जाता है।

हृदय रोग की पूर्व सूचनाएं

(1) मोटापा
(2) तनाव
(3) उक्त रक्त चाप
(4) संजिवान

प्राकृतिक चिकित्सा एवं हृदय रोग का कारण

हृदय रोग हमारे अप्राकृतिक खानपान, रहन, सहन एवं उत्तेजक कारणों से होता है। धूम्रपान, शराब, चाय अन्य नशीले वस्तुओं का सेवन, अधिक नमक, घी, चर्बी जातीय भोजन, जन्तु जन्य आहार, मांस, अंडे का अधिक सेवन हमारे रक्त को दोषपूर्ण धमनियों को शक्तिहीन तथा सख्त बना देते हैं।

जिनसे हृदय को स्वाभाविक काम करने में कठिनाई होती है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। कई बार ज्यादा दवाईयों के सेवन रक्त दूषित हो जाता है  और हृदय में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते है।

हृदय रोग के प्रकार एवं लक्षण

(1) धड़कन (Palpitation)
(2) रक्त गांठ बनना (Thrombosis)
(3) हृदय शूल (Angina Peetoqus)
(4) हृदय अक्षमता (Heart Failure)

हृदय रोग एवं प्राकृतिक चिकित्सा उपचार 

रक्त स्त्रोत को पुष्टिदायक एवं शोधक आहार एवं आँतों की सफाई की हृदय रोग का भी उपचार है। अतः पेड़ पर मिट्टी की पट्टी नीबू के पानी का एनिमा लेकर पेट की सफाई कर ली जाय।

सुबह शाम कम से कम दो बार छाती की सहज लपेट अथवा पेट की लपेट 1-1 घण्टे के लिए दी जाय। दोनों समय ठंडे पानी से स्नान या ठण्डी तौलिया के घर्षण स्नान से हृदय की कार्यक्षमता बढ़ती है।

जब हृदय की धड़कर तेज हो उस समय 3, 4 तह की मोटी कपड़े की पट्टी ठण्डे पानी में भिगोकर हार्ट पर रखी जाय तो बड़ी लाभप्रद होती है।

अलकोहल, डेजीटेलिस, स्टिकनिया या दूसरी हृदय को शक्ति देने वाली दवाइयों से अधिक लाभ यह जल पट्टी करती है।

ठण्डे पानी का स्पर्श ही हृदय को शक्तिशाली बनाता है। परन्तु ठण्डे पानी की सहनशीलता धीरे-धीरे बढ़ानी चाहिए।

एकदम ठण्डा न अनुकूल पड़े तो पहले मामूली ठण्डा प्रयोग किया जाता है। हृदय की तेज धड़कन में ठंडी पट्टी, हृदय के विस्तार यानी जब हृदय बढ़ गया हो उसमें भी ठंडे पानी की पट्टी या छाती की ठंडी लपेटना बहुत लाभ पहुँचाती है।

परन्तु जब हृदय की धड़कन स्वाभाविक से कम रहे तो रीढ़ के ऊपर गरम-ठंडी सेंक दो बार गरम एक बार ठंडा के अनुपात से या 3 व 4 के अनुपात से करना चाहिए।

इससे धड़कन स्वाभाविक की जा सकती है। रोगी को यदि सर्दी, खासी कफ की शिकायत हो तो छाती की सहज लपेट एवं पाँवों की लपेट देनी चाहिए।

श्वाँस, खाँसी का कष्ट भी हृदय के रोगों में अक्सर हो जाता है, जिसे हृदय रोग का दमा कहते है।

इस अवस्था में 6 से 8 मिनटों का गरम पैरों का स्नान देने से लाभ होता है कोई भी गरम प्रयोग के देने के साथ सिर ठंडे पानी से धोकर, सिर पर ठण्डी पट्टी तथा हृदय पर ठण्डी पट्टी रखनी चाहिए।

हृदय के रोगी को प्रर्याप्त विश्राम, सदा ही विस्तर में आराम से पड़े रहकर लेना चाहिए। उत्तेजना एवं अधिक जल्दीबाजी के वातावरण में काम करना, दौड़ना बहुत अधिक चिन्ता, बहुत जल्दी उठना, भागना, शक्ति से अधिक काम करना, अधिक भोजन करना, रात्रि को जागना, संभोग क्रिया से सदा विरत रहना चाहिए।

स्त्रियाँ यदि हृदय-रोग से ग्रस्त हों तो गर्भधारण से बचना चाहिए। अन्यथा गर्भावस्था में प्राण संकट में पड़ जाता है। हृदय उतने बोझ को सहन नहीं कर पाता है।

सदा ही रोग की तीव्रावस्था में विश्राम ही सबसे बढ़कर उपचार समझना चाहिए किन्तु जब रोग ठीक हो और रोगी की अवस्था सुधरने लगे तब धीरे-धीरे बहुत धीमी गति से टहलना या अन्य आरामदेह किस्म के व्यायाम योगासन, प्राणायाम करना चाहिए।

जिस प्रकार रोग की तीव्र अवस्था में आराम ही एकमात्र उपचार है, उसी प्रकार स्वाभाविक स्वास्थ्य हो जाने पर आगे के लिए हृदय की माँसपेशियां सुडौल और पुष्ट बनें, इसके लिए व्यायाम आवश्यक है। रोगी को 2500 फीट से अधिक ऊचाँई तथा बहुत अधिक ठंडी जलवायु भी अनुकूल नहीं पड़ती है।

हृदय रोग एवं प्राकृतिक चिकित्सा आहार

शारीरिक से अर्थ है बिस्तर में पड़े रहना, मानसिक का अर्थ है उत्तेजना, क्रोध आदि से बचना, शरीर क्रिया से मतलब पाचन को भी विश्राम देना अर्थात् थोड़ा खाना सुपाच्य आहार लेना।

इसलिए एक बार में अधिक ठूँस-ठूँसकर खाना अत्यन्त विपत्तिदायक होता है। अतः रोगी थोड़ा-थोड़ा करके दिन में 4-5 बार खाये। रोगी को कैलशियम प्रधान भोजन, दूध, परन्तु यदि वायु बनती हो तो दही या छेना लेना चाहिए।

सफेद चीनी के बदले गुड़ या शीरा लेना चाहिए। अंकुरित गेहूँ, कच्चा या उबला, भीगे अंकुरित चले, मूँग, चोकर समेत गेहँ की रोटी, अनपालिश चावल धान का लावा, लेटुस, पालक, मटर की कली, संतरा, अनार अनानास, नीबू, टमाटर, जामुन, आम भींगी किसमिश, शहद, आँवला, सेव, अमरूद इत्यादि से सभी खाध्य सुपच्य है।

सुपाच्य भोजन भी मात्रा से अधिक होने पर वह कुपाच्य ही होगा। अतः थोड़ी खाने की प्राथमिकता रखनी चाहिए। मोटापा इस रोग का दुश्मन है।

अतः यदि शरीर भारी हो तो चर्बी घटाने का शीघ्र प्रयत्न होना चाहिए। इसके लिए धीरे-धीरे आहार में से स्टार्च, प्रोटीन, चिकनाई कम करके फल सब्जी यथेष्ठ मात्रा में लेने लग जाना चाहिए।

प्रारंभ में हम बतला चुके है कि किन-किन कारणों से हृदय-रोग होता है उन कारणों से बचना चाहिए। हृदय के रोगों को एक बार में ज्यादा-ज्यादा पानी न दिया जाय थोड़ा-थोड़ा पानी ही दिया जाना चाहिए।

हर बार नीबू पानी मिलाकर दिया जाय। अधिक पानी देने से रक्तचाप ज्यादा बढ़ सकता है। और कम पानी देने से शरीर का विष जो उचित मात्रा में मूत्र एवं पसीने से निकल जाना चाहिए वह न निकलने से रक्तचाप घटकर और पेशाब कम होकर विपत्तिजनक अवस्था आ सकती है।

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