‘दिल बेचारा’ फिल्म रिव्यू: हंसते- हंसते ज़िंदगी सेलिब्रेट करना सिखा गए सुशांत सिंह राजपूत

'Dil Bechara' movie review

‘एक था राजा एक थी रानी दोनों मर गए खत्म कहानी’ ये है फिल्म ‘दिल बेचारा’ की कहानी.

सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फिल्म ‘दिल बेचारा’ देश-विदेश के दर्शको में एक साथ OTT प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज कर दी गई है. सुशांत के फैन्स को उनकी आखिरी फिल्म पसंद आएगी लेकिन फिल्म का दर्द भरा थीम शायद इस फिल्म को उतने लोगों से ना जोड़ पाए जैसे सुशांत की पिछली फिल्म छिछोरे ने जोड़ा था। कल हो ना हो, आनंद और अंखियों के झरोखे जैसी फिल्मों की तरह इस फ़िल्म ने भी इमोशन जगाने की पूरी कोशिश की हैं।

दिल बेचारा जॉन ग्रीन की नॉवल ‘द फॉल्ट इन आवर स्टार्स’ पर बेस्ड उसी नाम से बनी हॉलीवुड फिल्म ‘द फॉल्ट इन आवर स्टार्स’ का रीमेक हैं। फिल्म का थीम है मौत और प्यार और अजीब बात है कि सुशांत की रियल लाइफ मौत ने भी सबके लिए सवाल पैदा कर दिए लेकिन इस फिल्म में उन्होंने मौत के लड़ने के कई फलसफे बताए हैं।

जन्म कब लेना है और कब मरना है ये तो हम डिसाइड नहीं कर सकते, लेकिन कैसे जीना है ये हम डिसाइड करते हैं”. दिल बेचारा का ये डायलॉग जिंदगी को जीने की एक अलग उम्मीद जगाता है लेकिन इस ऑनस्क्रीन बोलने वाले सुशांत सिंह राजपूत ने अपनी जिंदगी खुद अपने हाथों ही ले ली. आज उनकी आखिरी और बहुप्रक्षिशित फिल्म ‘दिल बेचारा’ रिलीज हो गई है और इस फिल्म में उन्हें पर्दे पर देखने के बाद कुछ पलों के ऐसा महसूस होता है मानो वो कहीं गए ही नहीं और यहीं हमारे बीच हैं.. लेकिन ये सच नहीं है. अब सुशांत सिंह राजपूत हमारे बीच नहीं हैं और वो अपनी इस आखिरी फिल्म से दर्शकों को एक बार एंटरटेन करते नजर आ रहे हैं. फिल्म से संजना सांघी बतौर लीड एक्ट्रेस अपना डेब्यू कर रही हैं. ऑनस्क्रीन दोनों की कैमेस्ट्री बेहद खास नजर आ रही है. हालांकि बतौर एक्ट्रेस ये संजना की पहली फिल्म नहीं है इससे पहले वो सपोर्टिंग रोल और बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट कैमरे पर नजर आ चुकी हैं.

कहानी (Storyline)

जमशेदपुर में किज़ी बासु नाम की एक लड़की रहती है, जिसे थायरॉयड कैंसर है। हर जगह वो अपने साथ ऑक्सीजन सिलिंडर लेकर घूमती है. उसे पता है कि उसके पास ज़्यादा समय नहीं है, इसलिए वो बस अपने दिन गिन रही है। ठीक इसी समय उसकी लाइफ में मुस्कुराता हुआ इमैनुएल राजकुमार जूनियर उर्फ मैनी एंट्री मारता है। मैनी को ऑस्टियोसारकोमा (एक किस्म का बोन कैंसर) था, जिसके ऑपरेशन के बाद वो अपना सपना खो चुका है। लेकिन उसकी खुशमिजाजी कहीं नहीं गई। दोनों को पता है कि उनकी लाइफ लंबी नहीं है, इसलिए वो उसे बड़ी बनाने में लग जाते हैं। इन खुशियों के बीच एक अनकहा सा दुख भी है कि कैंसर किसकी जान पहले लेता है।

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मौत से लड़ते-लड़ते कीजी और मैनी दोनों करीब आ जाते हैं. कीजी के हर सपने को पूरा करके मैनी पूरी कोशिश करता है पर आखिर में खुद जिंदगी से खुशी-खुशी लड़ते हुए चला जाता है। लेकिन मरते-मरते को कीजी को जीवन में प्यार देकर खुश रहने का मंत्र दे जाता है। फिल्म की दो कैंसर पेशेंट्स की है किजी (संजना सांघी) और मैनी (सुशांत सिंह राजपूत) दोनों ही अलग-अलग कैंसर से पीड़ित हैं। दोनों की मुलाकात भी कैंसर हॉस्पिटल में ही होती है। मैनी पहली नजर में ही किजी को दिल दे बैठता है और उसे अप्रोच करने लगता है। लेकिन किजी को लगता है कि वो ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पाएगी इसलिए वो मैनी से दूरी बना लेती है। लेकिन बाद में उसे मैनी की जिद के आगे हार माननी ही पड़ती है। मैनी जहां बेहद चुलबुला और खुश मिजाज शख्स है तो वहीं किजी थोड़ा खुद में समिटी हुई सी है। लेकिन मैनी उसे धीरे-धीरे जिंदगी का ताल पर नाचना सिखा देता है। इस सब के बीच कहानी में एंट्री में होती है सिंगर अभिमन्यू वीर (सैफ अली खान) की। हालांकि अभिमन्यू स्क्रीन पर तो कुछ ही देर के लिए दिखते हैं लेकिन उनका जिक्र फिल्म में शुरू से लेकर अंत तक होता रहता है।

निर्देशन व तकनीकि पक्ष

जॉन ग्रीन की किताब द फॉल्ट इन आवर स्टार्स को भारतीय दर्शकों के पसंद को ध्यान में रखते हुए पटकथा में बदला है शशांक खेतान और सुप्रोतिम सेनगुप्ता ने। हालांकि किताब से फिल्म बनाने की प्रक्रिया में कहानी अपना चार्म खो देती है। कहानी में वो गहराई और भावनात्मक आर्कषण नहीं दिखता है। कमजोर पटकथा के बीच झूलती फिल्म को एआर रहमान का संगीत और बेहतरीन स्टारकास्ट बचाती है। बतौर निर्देशक यह मुकेश छाबरा की पहली फिल्म है। उन्होंने पटकथा के सभी किरदारों को स्क्रीन पर अच्छा मौका दिया है। कमजोर पटकथा के बीच भी उन्होंने किज्जी- मैनी और परिवार के बीच कुछ यादगार लम्हे बुने हैं। सत्यजीत पांडे की सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है। जमशेदपुर और पेरिस की खूबसूरती के बीच लीड किरदारों को बेहतरीन दिखाया गया है।

संगीत (Songs)

फिल्म का संगीत एआर रहमान ने दिया है, जो सीधे दिल से कनेक्ट करता है। गीतकार हैं अमिताभ भट्टाचार्य। रहमान की संगीत में एक खास बात है कि वह धीरे धीरे खुमार की तरह चढ़ती है, इस फिल्म के गाने भी लंबे समय तक आपके दिमाग में चलते रहेंगे। फिल्म का टाइटल ट्रैक ‘दिल बेचारा’, मसखरी, तारे गिन कानों को सुकून देता है। फिल्म के एल्बम में कुल 8 गाने हैं।

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देंखे, या ना देंखे?

फिल्म ना देखने का शायद सवाल ही नहीं उठता है। जिंदगी में काफी कम क्षण ऐसे आते हैं, जब आप सभी कुछ भूलकर भावनाओं में बह जाना चाहते हैं। ‘दिल बेचारा’ देखना वैसा ही है। यह सुशांत सिंह राजपूत के लिए एक मेमोरियल की तरह है। मैनी की तरह ज़िंदादिल सुशांत को आप दिल में रखना चाहते हैं। फिल्म की बेहतरीन स्टारकास्ट के लिए ‘दिल बेचारा’ देखी जानी चाहिए।

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रिव्यू: (Reviews)

अगर आप सुशांत के फैन हैं तो बहुत रो चुके उनको याद करके, यह फिल्म आपको सुशांत के लिए हंसना सिखाएगी। सुशांत को देखकर आपका मन खुश हो जाएगा। मैनी के रोल में शायद सुशांत से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था। सुशांत का पहला सीन निश्चित तौर पर फैन्स को इमोशनल कर जाएगा। मैनी एक मस्तमौला लड़का है जिसे किसी का फर्क नहीं पड़ता है। फिल्म देखकर पता चलता है कि सुशांत को हमने तब खोया है शायद जब वो अपने बेस्ट पर थे। उनकी ऐक्टिंग और कॉमिक टाइमिंग गजब की है। सुशांत के फेशल एक्सप्रेशन और डायलॉग डिलिवरी, वॉइस मॉड्यूलेशन सब बेहतरीन है। अपनी पहली ही फिल्म में संजना सांघी ने इतनी अच्छी परफॉर्मेंस दी है कि कहीं से भी नहीं लगता है कि यह उनकी डेब्यू फिल्म है। किजी की ऐंग्री यंग वुमन मां के किरदार में स्वास्तिका मुखर्जी छा गई हैं। एक ऐसी मां जो हर समय अपनी कैंसर से जूझती लड़की का ख्याल रखती है। किजी के पिता के रोल में साश्वता चटर्जी बेहतरीन हैं जो एक बिंदास बाप का किरदार निभा रहे हैं। वह अपनी बेटी की स्थिति समझते हुए भी उसे हर खुशी देते हैं और उनकी आंखों में अपनी बेटी के लिए दुख भी दिखाई देता है। पैरिस में अभिमन्यु के तौर पर मिलते हैं सैफ अली खान जो एकदम बदतमीज और अक्खड़ आदमी है। 2 मिनट के रोल में सैफ अली खान छाप छोड़कर जाते हैं।

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